संस्कृति संजीवनी एवं श्रीमद भगवत गीता

इतिहास में कभी - कभी ऐसा होता है की अवतारी सता एक साथ बहुआयामी रूपों में प्रकट होती है एवं करोड़ो ही नही ,पूरी वसुधा के उद्धार - चेतनात्मक धरातल पर सबके मनो का नये सिरे से निर्माण करने आती है | परमपूज्य गुरुदेव पं . श्रीराम शर्मा आचार्य को एक ऐसी ही सत्ता के रूप में देखा जा सकता हैं जो युगों -युगों में गुरु एवं अवतारी सत्ता दोनों ही रूपों में हम सबके बीच प्रकट हुई ,अस्सी वर्ष का जीवन जिकर एक विराट ज्योति प्रज्ज्वलित कर उस सूक्ष्म ऋषि चेतना के साथ एकाकार हो गयी जो आज युग परिवर्तन को सन्निकट लाने को प्रतिबद्ध है |परमवन्दनीया माताजी शक्ति का रूप थी जो कभी महाकाली ,कभी माँ जानकी ,कभी माँ शारदा एवं कभी माँ भगवती के रूप में शिव की कल्याणकरी सत्ता का साथ देने आती  रही है | उनने भी सूक्ष्म में विलीन हो सवयं को को अपने आराध्य के साथ एकाकार कर ज्योतिपुरुष का एक अंग स्वयं को बना लिया 

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